आज़ादी: सरकार के तीन बन्दर

इकीसवीं सदी का भारत देश।
आज़ादी के 70 साल हो गए हैं हमें।
कुछ ही दिनों में अपनी आज़ादी का जश्न भी धूमधाम से मनाएंगे।
उस दिन सबको याद आएगी शहीद सरदार भगत सिंह की क्रांति।
लेकिन सवाल आज यह है कि किस बात की आज़ादी मनाते हैं हम?
सवाल आज भी वही है जो अंग्रेजों के खिलाफ लड़ते हुए भगत सिंह ने उठाया था कि अगर इन अंग्रेजों से आज़ाद हो भी जाते हैं तो अपने ही देश में गुलाम बन कर रह जाएंगे और आज हो भी वही रहा है।

कहीं किसी को महज शंका हुई की किसी के घर के अंदर फ्रिज में गाय का मांस है तो उसे पीट पीट कर मार डाला। किसी ने उन मारने वालों से क्यों नही यह सवाल पूछा की किसी और के घर में जबरन घुस कर उसका फ्रिज खोल के देखने का अधिकार उन्हें किसने दिया। एक पल के लिए मान लिया की उस इंसान के घर में गाय का मांस था तो यह लोग कौन होते हैं इन्साफ करने वाले?
अरे गाय को माता कहने वालों, जरा निकल कर देखो सडकों पर तम्हारी माँ प्लास्टिक खा रही है। जरा देखो तम्हारी प्यारी माँ प्यासे मर रही है। लेकिन नहीं! ऐसे कैसे? जिसने गाय का मांस खाया उसको सबक सिखाना ज्यादा जरुरी है। आखिर गाय की जिंदगी इंसान से ज्यादा जरुरी है न। हो भी क्यों न। आखिरकार गाय हमारी माता है। और ऐसे राष्ट्रवादी लोगों को तो “आज़ादी” है किसी को भी कहीं भी जान से मार दें।

एक लड़का ना जाने कितने सपने सजाये, ना जाने कितनी उम्मीदें ले कर अपने घर से दूर देश के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में पढाई करने आता है। एक छात्र संघ के कार्यकर्ताओं से उसकी झड़प होती है और उसके अगले दिन से वह लड़का गायब हो जाता है। उसकी अम्मी को हॉस्टल की सीढ़ियों पर 5 दिनों तक इंतज़ार करवाया जाता है और फिर भी उस मासूम को ढूंढने के लिए कुछ नहीं किया जाता। उसको गायब हुए आज 9 महीने हो गए और आज भी उसका परिवार आस लगाए बैठा है। सही है, आज़ाद हैं हम। जिसको चाहें जब चाहें जहाँ से चाहें गायब कर देने की आज़ादी है हमे।

ट्रेन में अगर मैं अपनी सीट से नहीं उठता हूँ तो सबसे बड़ा देशद्रोही हूँ मैं। आखिर जिसकी सरकार है, बैठने का हक़ भी तो उसी का होना चाहिए न। फिर मेरा क्या, मैं तो गरीब हूँ। नहीं उठा तो इतना मारा गया कि बैठना तो दूर की बात दुबारा उठने लायक नहीं छोड़ा। कैसे भूल गया था मैं की आज़ादी है उन्हें ट्रेन में मुझे उठाकर खुद बैठने की और अगर मैं ऐसा ना करूँ तो मुझे जान से मार देने की।

सबसे बड़ी बात तो यह है कि अब मैं सोशल साइट्स पर भी अपनी पसंद का पोस्ट नहीं लिख सकता। अगर लिखूंगा तो मुझे नजरबन्द कर दिया जाएगा।

कहता तो हूँ मैं बड़े गर्व से की मेरा भारत महान। कोई यह तो बताए की यह नारा मुझे ख़ुशी से लगाना चाहिए या किसी के डर से। गौ हत्या के नाम पर लोगों को मारना अगर सही है तो उसके खिलाफ अपनी आवाज़ उठाना क्यों गलत है? किसी ने गाय की हत्या कर दी तो वह सबसे बड़ा पापी तो इंसान की हत्या करने वाला क्यों सही है?
बात करते हैं अगर आज़ादी की तो क्यों एक आज़ाद लड़का फेसबुक पर कुछ पोस्ट करता है तो उसकी आज़ादी उससे छीन कर उसे नजरबन्द कर दिया जाता है?

क्या इसे सही मायने में आज़ादी कहेंगे?
आजकल सरकार के खिलाफ बोलने वाले देशद्रोही और सरकार के पक्ष में बोलने वाले राष्ट्रवादी बन गए हैं।
उ.प्र. में रहना है तो योगी योगी कहना है।
क्यों भाई? अगर नहीं कहूंगा योगी योगी तो मैं राष्ट्रद्रोही हो गया?
अगर नमो नमो ना कहूँ तो देशद्रोही हो गया?
यही अच्छे दिन दिखाने वाले थे आप?
खैर इनसे जवाब की उम्मीद करना भी पाप है।
क्या पता आज मैं सवाल करूँ और कल से किसी को दिखाई ना दूँ। या यह भी हो सकता है कि सुबह होने से पहले मेरे घर पे CBI छापा मारने चली आए।

तो आज के भारत में आज़ादी का सीधा सीधा मतलब सरकार के तीन बन्दर बताते हैं। अगर आप अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा चाहते हैं तो आपको यह तीन बातें याद रखनी होंगी-
सरकार के खिलाफ मत बोलो।
सरकार के खिलाफ मत सुनो।
सरकार के खिलाफ मत देखो।

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2 thoughts on “आज़ादी: सरकार के तीन बन्दर

  1. मान गए भाई आपकी कलाकारी । उस्ताद मज़ा आ गई पढ़ के ।

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