चलता जा रहा हूँ

तप्ति धुप में,
नंगे पाँव दौड़ता जा रहा हूँ।
ना पैरों में पड़े छालों की फिक्र है,
और ना ही मंजिल का कोई अता-पता।
बस सुनसान राहों पर आगे बढ़ता जा रहा हूँ।
ना जाने कहाँ चलता जा रहा हूँ।।

मिला था जो भी प्यार से मुझे,
मैं तो उसी का हो लिया था।
जब थोड़ा वक्त बीत गया,
तब मालूम हुआ,
गलत जगह दिल लगा बैठा था।
फिर भी जिंदगी की राह पर,
अकेले बढ़ता जा रहा हूँ।
पता नहीं कहाँ चलता जा रहा हूँ।।

नहीं,
मैं पहले ऐसा नहीं था।
कोई जरुरत नहीं हुआ करती थी मेरी,
और ना ही कोई मेरे लिए जरुरी था।
पहले शायद होश में रहता था मैं,
अब मदहोशी में चला जा रहा हूँ।
खुद भी नहीं जानता,
कहाँ चलता चला जा रहा हूँ।।

वो बचपन की हसीन वादियां,
इस दिखावे की दुनिया से तो बेहतर ही थी।
थाम रखा था तब दामन सच्चाई का,
अब तो दिल में खोट,
और चेहरे पर मुखौटा ही ठीक लगता है।
हाँ, मैं खुद से ही खुद को,
अलग-थलग कर रहा हूँ।
अपने आप से दूर,
ना जाने कहाँ चलता जा रहा हूँ।।
बस,
चलता जा रहा हूँ।।

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