निर्भया – मदद की गुहार

एक हँसती खेलती दुनिया थी उसकी।
कुछ दरिंदों ने उसका संसार ही उजाड़ दिया।
चकनाचूर कर दिए उसके ख़्वाब सारे।
और उस बेचारी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

आख़िर गलती क्या थी उसकी?
किस गलती की ऐसी सज़ा मिली उसको?
क्या किसी मित्र संग घूमने जाना पाप है?
या सूरज ढलने के बाद घर लौटना अभिषाप है?

माँ की दुलारी थी वह,
पापा की थी राजकुमारी।
अपने साथ सबको खुश रखती थी।
कुछ ऐसी ही थी उसकी दुनिया सारी।

कई सपने आँखों में लिए,
उन्हें साकार करने की राह पर निकली थी।
आखिर उसे भी तो नहीं थी भनक इस बात की,
कुछ ही पलों में खत्म उसकी जिन्दगी।

हँसते हुए निकली थी अपने घर से,
किसे पता था कभी लौट के नहीं आएगी।
किसे पता था अपनी छोटी सी दुनिया छोड,
सारे जहाँ में अमर हो जाएगी।

किस बर्बता से पेश आया गया उसके साथ!
ना साँसें चलने लायक छोड़ा,
ना तन ढकने दिया,
बस अपने अंदर की हवस मिटाई,
और बीच सड़क पर अधमरा छोड़ दिया।

उस अंधेरी रात,
किसी ने नहीं सुनी मदद की गुहार,
मगर अगली सुबह सबको लगी इंसाफ की प्यास।
खड़े हो गए ले कर मोमबत्तियां नुक्कड चौराहों पर,
मचा दिया पूरे देश में हाहाकार।

आखिरकार जाग उठा प्रशासन,
बना दिए नए नियम कानून फिर एक बार।
कितना बदलाव आ गया समाज में उसके बाद?
क्या थम गया इस देश में बलात्कार?
बन गया हमारा देश महान?

उस रात जो भी कुछ हुआ,
कौन था उसका जिम्मेदार?
उन हत्यारों को तो सुना दी सजा मौत की,
उन्हे कौन देगा सजा,
जिन्होने उस रात मानवता को किया बदनाम?

क्यों किसी को उस मासूम में,
अपनी माँ बहन बेटी नहीं दिखाई दी?
क्यों उस काली रात,
हर इंसान को घर पहुँचने की जल्दी थी?

शायद बचाई जा सकती थी निर्भया की जान।
अगर इंसाफ की जंग में शामिल होने से पहले,
किसी एक व्यक्ती ने भी सुनी होती,
उसकी खामोशियों की पुकार।
शायद हमारे बीच होती वो आज,
अगर किसी ने उस वक्त सुन ली होती,
एक मदद की गुहार।

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