बस प्यार को तरसा

क्यों मेरी जिंदगी में इतनी कठिनाइयां हैं?
क्यों हर पल प्यार को तरसा हूँ?
आख़िर गलती क्या है मेरी,
क्या इतना बुरा हूँ मैं?

क्यों बचपन से लेकर आज तक,
माँ के आंचल को तरसा हूँ?
शायद पिछले जन्म के पापों का प्राच्छित है यही,
जो बाप के प्यार को तरसा हूँ।

जब स्कूल में एनुअल डे होता था
किसी कोने में अकेले छुप छुप के मैं रोता था।
हर दोस्त के माँ-बाप से मैं मिलता था
बस अपनों के प्यार को तरसता था।

गलती करने पर जब सब अपने पापा को फ़ोन करते थे
क्यों मैं उनकी एक आवाज़ सुनने को मरता था?
कोई तो बता दो मुझे
कौनसी गलत ख्वाहिश मैं रखता था?

क्यों कभी किसी ने नहीं समझा,
मुझे भी तम्मना है माँ के हाथों खाना खाने की।
मेरी भी ख्वाहिश है,
पापा संग कहीं दूर घूमने जाने की।

क्यों अपना होते हुए भी कभी अपना नही समझा मुझे?
क्यों अपने आप से इतना दूर कर दिया है मुझे?
क्या मैं इतना बुरा हूँ?
जो इस हद्द तक पराया कर दिया है मुझे?

एक घुटन सी होती है कभी कभी मुझे,
किसी से बयां भी नहीं किया जाता ये दर्द।
बस इतनी सी है कहानी मेरी,
सब कुछ मिला,
बस प्यार को तरसा।

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4 thoughts on “बस प्यार को तरसा

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