इश्क़ का सुरूर

ना इज़हार करने की हिम्मत दी,
ना ही मुझे इंकार करने दिया।
इश्क़ का सुरूर कुछ इस कदर चढ़ा,
ना होश में रहने दिया, ना मदहोश होने दिया।।

तपती धूप में छांव की ख्वाइश नहीं थी,
बस उसकी उन जुल्फों में खुद खोना चाहा।
सवार होकर प्यार की कश्ती में,
उसके नैनों के भंवर में डूबना चाहा।।
इश्क़ का सुरूर कुछ इस कदर चढ़ा,
ना इश्क़ का खेल जीत सका, ना हारना चाहा।।

क्या अमीर, क्या गरीब
सबकी चौखट पर शबाब माँगा।
लाखों दुआएं मांगी अपने खुदा से,
हर दुआ में उसका प्यार माँगा।।
इश्क़ का सुरूर कुछ इस कदर चढ़ा,
प्यार के गीत गाता गया, नग्में सभी को सुनाता गया।।

साथ थी तो बस तेरी यादें और मेरी तन्हाई,
ऐसा अकेलापन मुझे लगने लगा।
फिर किसी के साथ होने का इशारा हुआ,
बादल गरजने लगा, आसमान बरसने लगा।।
इश्क़ का सुरूर कुछ इस कदर चढ़ा,
ना तुझे अपना बना सका, ना तुझे भुला सका।।

कसमे वादे भूलना सीखा दिया,
तनहा चांदनी रातों में सितारे गिनना सीखा दिया।
सीखा दिया टूटे ख्वाबों संग रहना,
वफ़ा ने बेवफाई, दगा देना सीखा दिया।।
इश्क़ का सुरूर कुछ इस कदर चढ़ा,
ना अपना बना लिया, ना किसी और का होने दिया।
इश्क़ का सुरूर कुछ इस कदर चढ़ा,
ना चैन से जीने दिया, ना ख़ुशी से मरने दिया।।
इश्क़ का सुरूर कुछ इस कदर चढ़ा।।

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